ईदुल अदहा (क़ुर्बानी) का हक़ीक़ी पैग़ाम
ईदुल अदहा के दिन आयशा अपने घर के आंगन में सर झुकाए बैठी थी इस इंतज़ार में कि कोई पड़ौसी या रिश्तेदार जिन्होंने क़ुर्बानी की हो तो वो कुछ गोश्त ला कर दे दें। तो वो अपने बच्चों के लिए खाना बना सके। ईद की नमाज़ पढ़ कर उसके शौहर भी घर आ गए थे। उन्हें भी यही फ़िक्र थी जो आयशा को थी उनके चेहरे पर तो फ़िक्र की लकीरें थी। लेकिन दिखावे के लिए वो अख़बार के पन्नों को उलट पलट कर रहे थे। फ़िक्र इस लिए थी कि जो कुछ कमाते उस से घर का ख़र्च बड़ी मुश्किल से चलता था जिसमें अपने अहलो अयाल की परवरिश और बच्चों की पढ़ाई का बोझ अलग। लेकिन ग़रीब बाप इस उधेडबुन में था कि आज मेरे घर में कम से कम इतना तो गोश्त कहीं से आ जाए कि मेरे बच्चे आज तो महरूम न रहें। वो आसमान की तरफ़ देख कर जैसे मन ही मन रब से फ़रियाद कर रहा हो। और उसकी आंखों में आंसू भर आए। अभी थोड़ी ही देर गुज़री थी कि दरवाज़े पर दस्तक हुई।। फ़हीम भाई। फ़हीम भाई। बाहर आइये आवाज सुन कर उस शख्स ने चप्पल पहने और बाहर आया। उसने सलाम करते हुए ईद की मुबारक बाद दी और कहा। आपकी दुआ से घर पे क़ुर्बानी की है ये लीजिए गोश्त। कहते हुए उसने प्लास्टिक थैली जिस में मुश्किल से किलो भर के आसपास गोश्त होगा उनको थयाई और सलाम कर के रुख़सत हो गया। फहीम भाई का चेहरा जो अभी थोड़ी देर पहले मायूस था। उस पर ख़ुशी की लहर दौड़ गई। अपने रब का शुक्र अदा किया और घर में आ कर बीवी को वो थैली थमाते हुए। कहा आइशा लो। रब ने सुन ली लो पकड़ो ये गोश्त और अच्छे से लज़ीज़ सालन बना कर सबसे पहले मेरी बेटी साइमा को खिलाओ।
ये मंज़र देख कर आइशा की ख़ुशी का भी कोई ठिकाना नहीं रहा। ख़ुशी ख़ुशी थैली लेकर किचन की तरफ़ तेज़ बढ़ते हुए। उसने थैली को खोल कर सरसरी तौर से देखा तो
उसमें चर्बी ज़्यादा दिखाई दे रही थी। उसने सोचा क़ुर्बानी के बकरे ज़्यादा तर फर्बे और तंदरुस्त होते हैं। इसलिए इनमें चर्बी का ज़्यादा होना क़ुदरती बात है। मगर जब उसने अच्छी तरह से थैली से बाहर निकाल कर देखा तो। उसमें सिवाए चर्बी के और कुछ था ही नहीं। यानी कहने को एक बोटी भी गोश्त की वो देने वाला जो थोड़ी देर पहले बड़े फ़ख्र से फहीम भाई को थैली पकड़ा गया था। दे कर नहीं गया। ये मरहला आइशा के लिए ठीक वैसा ही था जैसे कोई कश्ती किनारे पर आते आते डूब जाती है। चेहरा लटकाए मायूसी के साथ आंखों में आंसू लिए चुपचाप वो थैली ज्यों की त्यों फहीम भाई के पास ला के रख दी। फहीम भाई ने पूछा तो आइशा ने भर्राई आवाज़ में कहा। जी ख़ुद ही देख लीजिए इस में सिर्फ चर्बी के अलावा और कुछ भी नहीं। ये सुनकर फ़हीम भाई बेचारे दोबारा मायूस हो गए। सायमा अपने कमरे में जो कि अपने अम्मी अब्बू की बातें बड़े ध्यान से से सुन रही थी। आख़िर उसके सब्र का बांध टूट गया। वो अपने पेट पर हाथ रखते हुए उसे दबा कर बाहर आंगन में आई और कहने लगी, अम्मी ' अब्बू। मेरे पेट में बहुत तेज़ दर्द हो गया है। इस लिए मैं खाना नहीं खाऊँगी। शाम को अगर भूख लगेगी तो कुछ हल्का दलिया वगैरह खा लूंगी। इतना सुनना था कि वो मां बाप जो बचपन से अपने जिगर के टुकड़े को पालते पोसते आए थे। उसकी हर आदत से वाक़िफ थे। समझ गए कि सायमा झूठ बोल रही है। लेकिन पढ़ाई लिखाई के साथ साथ जो सब्र की तालीम उन्होंने बेटी को दी थी। आज उसका मुज़ाहिरा जब देखा तो मारे ख़ुशी के उनकी आंखों से जारी हो गये उन्होंने बेटी को गले लगाया और फूट फूट के रोने लगे। ईद के दिन घर के आंगन में सिसकती आहों का शोर किसी अजूबे से कम नहीं था। और न किसी को इतनी फुर्सत के वो आ के सबब ही पूछ लेता रोने का।। बहर हाल चंद पल बीते कि दरवाजे पर फिर दस्तक हुई। आवाज़ सुन कर फ़हीम भाई दोबारा बाहर निकले। इस बार दूसरा कोई भला शख़्स था। जिसके हाथ में थैली थी। और उस थैली में करीबन दो तीन किलो क़ुर्बानी का गोश्त था। आने वाले ने सलाम व रस्मी गुफ़्तगू के बाद वो थैली फ़हीम भाई को देते हुए निहायत आजज़ी के साथ कहा कि फ़हीम भाई हमारी फैमिली छोटी है। इतना गोश्त हम लोग खा नहीं पायेंगे इस लिए ये आधा गोश्त आप और आपके बच्चों के लिए है। पड़ा पड़ा ख़राब होगा इससे तो अच्छा है कि ये काम आ जाए। फहीम भाई ने शुक्रिया अदा करते हुए वो थैली ला कर बेगम को दी और फिर सबने पेट भर कर खाया और उस भले शख्स के लिए दिल से दुआएँ कीं।। इत्तेफाक की बात कि उसी शाम मौसम बिगड़ा पहले आंधी बारिश और फिर तूफ़ान की वजह से बिजली घर के ट्रांसफार्मर जल गए लाइट चली गई हर तरफ़ अंधेरा छा गया। रात तो जैसे तैसे गुज़र गई। सुबह हुई तो भी लाइट का दूर दूर तक कोई अता पता नहीं। इसी तरह लगातार तीन दिन और तीन रात तक लगातार बिजली गायब रही। जिसके नतीजे में वो लोग जिन्होंने गोश्त को फ्रिज में भर कर रख दिया था उनके घरों में बदबू और सड़ांद से बाहर मुहल्ले तक बस बदबू ही फैल गई। लोगों का आना जाना और घरों में रहना मुश्किल हो गया। शाम को जब लाइट आई तो साइमा अपने अब्बू के साथ टहलने निकली। बाप बेटी घूमते हुए नदी के किनारे पर पहुंचे तो एक डॉक्टर साहब और एक इंजीनियर साहब अपने हाथों में बड़े बड़े थेले लिए और नाक पे रुमाल रखे आते दिखाई दिये। उन्होंने आ के सलाम किया। फिर उन थैलों को उनके सामने ही ज़मीन पर उलट दिया। साइमा उन दोनों का ये अमल बड़े ग़ौर से देख रही थी। जब वो लोग गोश्त डाल कर फ़ारिग़ हो गए तो। सायमा ने हैरत करते हुए अपने अब्बू से पूछा कि। अब्बू क्या इन लोगों ने क़ुर्बानी कुत्तों के लिए की थी????? अल्लाहु अकबर साइमा ये दर्द भरे अल्फाज़ अगरचे सख़्त हैं। लेकिन वो लोग जो क़ुर्बानी तो करते हैं मगर उसके हक़ीक़ी पैग़ाम से अभी तक ना आश्ना और अंजान हैं। या फिर जान बूझकर अंजान बनने का ढोंग करते हैं। क्या वो लोग नहीं जानते कि क़ुर्बानी के गोश्त को तीन हिस्सों में बांटने के पीछे अस्ल हिकमत ही यही है कि जो लोग माली तौर पर कमज़ोर हैं ताक़त नहीं रखते कि क़ुर्बानी कर सकें उन तीन हिस्सों में एक हिस्सा उन ग़रीबों को देने का हुक्म इसीलिए तो मुक़र्रर किया गया है कि वो नादार और कमज़ोर लोग भी महरूम न रहें। क़ुर्बान जाऊँ मेरी जान की जान रहमते आलमियान कौनैन के सुल्तान सल्लललाहु अलैहि वसल्ल्म की ज़ात पर जब आप क़ुर्बानी फरमाते तो रब से अर्ज़ करते ऐ अल्लाह ये क़ुर्बानी तेरी बारगाह में मेरी तरफ़ से है। और मेरे उस ग़रीब उम्मती की तरफ़ से है जो क़ुर्बानी की इस्तिताअत नहीं रखता। अल्लाह अल्लाह ऐसे करीम आक़ा। कि अपनी सारी हयाते तय्यबा में किसी मोड़ किसी मक़ाम और किसी मामले में अपने ग़रीब उम्मतयों को आपने कहीं फ़रामोश नहीं फ़रमाया।
और एक हम हैं। जिन्हें अपना खानदान परिवार दोस्त और अहबाब तो याद रहते हैं। लेकिन वो ग़रीब कमज़ोर और नातवां भाई याद नहीं आते जो ग़रीबी में पता नहीं किस तरह अपनी ज़िन्दगी काट रहे हैं।।। ख़ुदा रा अपने दिल पे हाथ रख कर हम सोचें। कि ये ईदुल अदहा जिसपे क़ुर्बानी करना हमारे बाप हज़रत इब्राहिम ख़लीलुल्लाह अलैहिस्सलाम की सुन्नत है। अगर इस सुन्नत को हम उस सिस्टम को फालो करते हुए अदा करेंगे तो यक़ीन जानिए। हमारी रुह को भी सुकून मिलेगा कल्बी सुकून और ख़ुशी भी हमें मयस्सर आएंगे इंशाअल्लाह। इस लिए कि यही इस ईद का हक़ीक़ी पैग़ाम है। अल्लाह करीम हम सब को अमल की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन बिजाहन्नबीय्यिल अमीन सल्लललाहु अलैहि वसल्ल्म
अज़ क़लम
असीरे दरबारे साबिर पाक
इरफ़ान नोमानी जाहिदी
बासनी नागौर राजस्थान
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