इमामे हुसैन इंसाफ़ प्यार और क़ुर्बानी के अज़ीम पैकर व इंसानियत के बेमिसाल रहबर



 


शहजादा ए गुल गूं क़बा राकिबे दोशे मुस्तफ़ा । राहते जाने फातिमा। लख़्ते दिले अली ए मुर्तजा। नूरे चश्मे हसने मुजतबा। सैय्यदुश्शुहदा। ताजदारे कर्बला। इमामे आली मक़ाम। सैय्यदना इमाम हुसैन व अला जद्दिहि अलैहिस्सलाम।  की हस्ती सब्र व शुक्र अज़्म हिम्मत ईसार सरफरोशी और बेमिसाल क़ुर्बानी की वो अज़ीम यादगार होने के साथ ही। इंकलाबात की एक दुनिया अज़्मो हौसले के जब्ले ओहद। सब्र व ज़ब्त हिम्मत व इस्तिक़ामत में । जिसकी मिसाल तारीख़ में दूर दूर तक कहीं भी नज़र नहीं आती। 


*विलादत* ::::


*आपकी पैदाइश 3 शाबान सन हिजरी 4- मुताबिक 8-जनवरी 626 ईस्वी - मदीना शरीफ़ में हुई*।


शहजादा ए अली व ज़ेहरा। *सैय्यदना इमाम हसन मुजतबा* रदिअल्लाहु अन्हु। आपके बड़े भाई हैं।

*फ़ज़ाइल व मनाक़िब* :::

ये दोनों नवासे अपने नाना मुस्तफ़ा करीम अलैहिस्सलाम को इस क़दर महबूब और प्यारे हैं। जो बयान से बाहर हैं। कई अहादीसे पाक। उस मिसाली मोहब्बत। और नाज़ बरदारी। का ख़ुत्बा पढ़ते नज़र आ रही हैं। सरकार सल्लललाहु अलैहि वसल्ल्म ने फ़रमाया कि हसन और हसन जन्नती नौजवानों के सरदार हैं। एक हदीस में है कि 

हसन और दो जन्नती फूल हैं। जो रब ने मुझे दुनिया में अता फ़रमाए हैं। यही वजह है कि जब हुज़ूर अपने सहाबा की मजलिस में बैठे होते और इमामैन खेलते हुए आ जाते तो आप उन्हें बे मिस्ल नबी अपनी बेमिसाल मोहब्बत नवासों पर न्योछावर करते हुए अपने बेमिसाल अंदाज़ का इज़हार फरमाते। यानी आप उन्हें सूंघा करते। तो सहाबा को हैरत होती कि सरकार। बच्चों को मोहब्बत में चूमना तो समझ आता है। ये सूंघने की हिकमत समझ में नहीं आई। तो आप मुस्कुरा कर फरमाते कि मुझे इनसे जन्नत की ख़ुश्बू आती है। और ये मेरे जन्नती फूल हैं। यही वो प्यारे नवासे हैं। कि हालते नमाज़ में अगर नबी सज्दे में हों। और दोशे रिसालत पर सवार हो जाएं तो। नबीयों के सुल्तान सल्लललाहु अलैहि वसल्ल्म। अपने सज्दों को लम्बा कर देते। और उस वक्त तक सज्दे से सर को नहीं उठाते। जब तक ख़ुद उतर न जाएं।  अहादीस तारीख़ व सियर की किताबें ऐसे बेशुमार फ़ज़ाइल व मनाक़िब से भरी हुई हैं। 


*तर्बियते ख़ास* 


रिवायत में आता है कि एक बार हज़राते इमामैन हस्नैन करीमैन को बचपन के आलम में सारी कायनात के दाता और मुख्तार सल्लललाहु अलैहि वसल्ल्म कुश्ती लड़वा रहे हैं। और सैय्यदना इमामे हुसैन से प्रेक्टिकली तौर पर बड़े ख़ुशी के साथ बतला रहे हैं। कि देखो अब हसन को ऐसे पकड़ो। ऐसे दांव लगाओ ऐसे उठाओ वगैरह वगैरह जो भी कुश्ती के दांव पेच होते हैं। सरकार वो सब हज़रत इमाम हसन को सिखा और बता रहे हैं। ये मंज़र देख कर जन्नती औरतों की सरदार हज़रत फातिमा ज़ेहरा रदिअल्लाहु अन्हा अर्ज़ करने लगीं। कि अब्बा जान। आप तो सिर्फ़ छोटे को ही बता रहे हैं। बड़े को तो कुछ बता ही नहीं रहे! ये सुन कर रहमते आलमियान दोनों आलम के सुल्तान सल्लललाहु अलैहि वसल्ल्म ने मुस्कुराते हुए फ़रमाया कि। बड़े को हज़रत जिब्रिल बता रहे हैं! तर्बियते ख़ास का ऐसा बेनज़ीर ज़ाविया। और जौहर जो अपने आप में कायनाते होश व ख़िरद को हैरान करने वाला होने के साथ साथ। क़ाबिले तक़लीद व नमूना अमल है। 


*बेमिसाल औसाफ़ के हामिल* 

बात जब ज़ुल्म के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने की हो या फ़ासिक़ व फ़ाजिर के सामने सर न झुकाने की हो। या फिर ज़ालिम ताक़त चाहे वो तादाद में सैकड़ों या हजारों ही क्यों न हो उसके ख़िलाफ़ पूरी बेबाकी व हौसले के साथ इंकलाब का झंडा उठाने की। तो फौरी तौर पर अहले ईमान व साहिबाने अद्लो इंसाफ़ के ज़ेह्नो में जो तस्वीर उभरती है। 

वो हज़रत इमामे हुसैन ही की होती है। कौन नहीं जानता कि आपके बचपन में आपके नाना सैय्यदुल अंबिया ने अपनी पीठ पर सवार किया और देख कर एक सहाबी ने कहा कि ऐ बच्चे तेरी सवारी कितनी अच्छी है। तो आक़ा करीम अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया कि ये भी तो देखो कि सवार कितना प्यारा है? मतलब ये कि सवारी अगर नबियों का सुल्तान है तो सवार शहीदों का सरताज है। और सबसे अहम बात यह है कि हुज़ूर ने अपने नवासे को पीठ पर सवार कर के अपनी मुबारक ज़ुल्फ़ें तक थमा दीं। इसमें इशारा ये था कि। ऐ मेरे नवासे आज अपने नाना की ज़ुल्फ़ें पकड़ ले कल मेरी सारी उम्मत की लगाम तेरे हाथ में दे दूंगा । इसलिए कि एक वक्त वो भी आएगा कि मेरा ही कल्मा पढ़ने वाले। मेरी शरीअत के साथ खिलवाड़ करने की नापाक कोशिश करेंगे। अपनी मर्जी से निज़ामे इस्लाम को बदलने की तदबीरें सोचेंगे। उस वक्त ज़ुल्म के पहाड़ टूटेंगे। तुम्हें तुम्हारे अह्लो अयाल के साथ मश्के सितम बनाया जाएगा। घर बार छोड़कर ग़रीबुल वतनी की तकलीफ़ें झेलनी होंगी।। खाना तो दूर की बात तुम पे और मेरे (अहले बैत) पर पानी तक बंद कर दिया जाएगा। अहले सितम अपनी पूरी ताक़त झोंक देंगे। कि तुम उनकी हाँ में हाँ मिला कर उनका साथ दो (बैअत) कर लो। लेकिन मेरे जिगर के टुकड़े उस वक्त तुम्हें सब्र व शुक्र का पैकर बन कर उनके खिलाफ़ जंग लड़नी है। ताकि हक़्क़ो बातिल के मारके में फ़तह का सेहरा हक़ के सर पर ही सजे। और हर हाल में मेरी शरीअत की हिफाज़त हो सके। ख़ुदा गवाह है कि ये मुस्तफ़ा की मिसाली और बे नज़ीर तर्बियत ही का नतीजा है और तारीख़े जंगे कर्बला ख़ुद शाहिद कि मेरे हुसैन ने। अपनी ज़िन्दगी की आख़री सांस तक ज़ुल्म का मुकाबला किया और इस शान से डटकर किया कि घर बार बीवी बच्चे भांजे भतीजे रिश्ते दार भूख प्यास सबकी परवाह किए बगैर ज़ुल्म और ज़ुल्म के हिमायतियों को मुंह तोड़ जवाब दिया और अपने ख़ून का आख़री क़तरा तक इस्लाम के शजर को पिला दिया मगर शरीअते मुस्तफ़ा व निज़ामे इस्लाम पर कोई आंच तक नहीं आने दी। वर्ना जंगें तो सैकड़ों और हज़ारों हुईं हैं। फिर क्या वजह है कि कर्बला की जंग सिर्फ मुसलमान ही नहीं बल्कि सारी नस्ले इंसानियत की आंखें भिगो देती है? और दास्ताने कर्बला पढ़ने के बाद दिल क्यों पसीज जाते हैं? उसका बिल्कुल सीधा सा आसान जवाब ये है कि कर्बला में क़ुदरत की तरफ़ से आले नबी का सख़्त इम्तिहान लिया गया। जिसमें पूरी कामयाबी मिली। क्योंकि रब का कलाम है हक़ आ गया और बातिल मिट गया बेशक बातिल को मिटना ही था "और फिर दुनिया ने देखा कि ज़ुल्म व सितम (यज़ीद और यज़ीदिय्यत) के अंधेरे जहान से मिट गये। 

और हुसैन नाम का सूरज आज भी पूरी आबो ताब के साथ चमक दमक रहा है और हर जगह हुसैनिय्यत के उजाले फैले हुए हैं।।। 


*हुसैनी पैग़ाम* 


हुसैन ने अपने नाना से जो वादा बचपन में किया था उसे कर्बला में पूरे तौर पर निभा के अपने मानने वालों को जो पैग़ाम दिया है वो यही है। कि हालात चाहे जैसे क्यों न हो लेकिन तुम अगर वाक़ई मुझ से मोहब्बत करते हो तो फिर मेरे तरीक़े पर चलते हुए कभी और किसी भी हाल में कहीं और किसी पर ज़ुल्म होते  देख कर कभी चुप मत रहो। न ज़ालिम की मदद करो। बल्कि अपने तौर पर हमेशा ज़ुल्म व सितम के ख़िलाफ़ लड़ो। ताकि तुम अल्लाह व रसूल की बारगाह के मुजरिम न बनो। क्योंकि दुनिया तो चार दिन की है और जान देर सवेर सबकी जानी है। ऐ लोगों मैं तुम्हें जीने और मरने दोनों के तरीके़ बता रहा हूँ। अगर हुसैन की ज़िन्दगी तुम्हें देखनी हो तो मुझे मेरी माँ फातिमा की आग़ोश में देख लेना। और अगर हुसैन का तुम्हें दुनिया से जाना देखना हो तो फिर हुसैन को कर्बला में देख लेना। तुम्हें ज़िन्दगी और मौत दोनों का फ़लसफा समझ में आ जाएगा। लिहाज़ा ज़रूरत आज अगर सही मानों में किसी बात की है तो वो ये कि जो शमा हुसैन ने रोशन की उसकी हिफाज़त हर हुसैनी की ज़िम्मेदारी है इंसाफ़ मोहब्बत और क़ुर्बानी यही जौहर हैं जो हमें आपकी सीरत में सबसे ज़्यादा नुमायां तौर पर मिलते हैं 

और सीरते हुसैन का तकाज़ा जो हमसे मुतालबा करता है वो यही है कि।।। 


    *फ़क़त ज़बान से कहने से कुछ नहीं होता* 

    *ज़रूरी  ये  है  कि  किरदार  भी  हुसैनी हो* 




अल्लाह पाक हम सब को सच्चा और पक्का हुसैनी बनाए 

आमीन बिजाहिन्नबिय्यिल अमीन। सल्लललाहु अलैहि वसल्ल्म।। 


            *गुबारे राहे अहले बैत* 

*इरफ़ान नोमानी जाहिदी* 


    बासनी नागौर राजस्थान

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